आ मुसाफिर!
बैठ जा,
कश्ती अभी खाली पड़ी है।
तू अकेला मै अकेला,
और आशातीत हूँ मैँ,
प्रेम मत करना शपथ है,
प्रेम से भयभीत हूँ मैँ;
विष पिये मीरा कि मूरत कृष्ण की काली पड़ी है।
मत घृणा करना ,
घृणा से,
तू डुबो देगा भँवर मेँ,
सोच तू ही साथ तेरे क्या बचेगा फिर सफर मेँ?।
बात अपने बीच कितनी सोचने वाली पड़ी है।
जा उतर जा आ गया तट ,
जा कि अपनी राह ले ले।
फिर न मुड़कर देखना अब
जो बची हो चाह, ले ले!
फिर वहीँ ताला पड़ा है फिर वहीँ ताली पड़ी है।

ज्ञान प्रकाश आकुल