सह चुके अब तो बहुत अब सर उठाना चाहिए
आदमी को आदमी होकर दिखाना चाहिए

कब तलक क़िस्मत की हाँ में हाँ मिलाते जाएंगे
अपने पैबंदों को अब परचम बनाना चाहिए

आंधियों में ख़ुद को दीये-सा जलाएँ तो सही
हाँ कभी ऐसे भी ख़ुद को आज़माना चाहिए

तू मेरे आँसू को समझे, मैं तेरी मुस्कान को
आपसी रिश्तों में ऐसा ताना-बाना चाहिए

हममें से ही कुछ को मेहतर होना होगा सोच लो
साफ़-सुथरा-सा अगर बेहतर ज़माना चाहिए

© नरेश शांडिल्य