जब अपना मुँह खोलो तुम
बात पते की बोलो तुम

ठीक वक़्त औ’ ठीक जगह
अपने पत्ते खोलो तुम

सोचो तुम क्या हो, क्यों हो
ख़ुद को कभी टटोलो तुम

वक़्त है धागा, मोती बन
ख़ुद को आज पिरो लो तुम

सपनों, मुझको जगना है
नौ दो ग्यारह हो लो तुम

दीपक गुप्ता