ख़ूबसूरती किसी इमारत के गमलों की
जैसे और भी निखरती है काट-छाँट से
हमसे ये बार-बार बोलते हैं संस्कार
प्यार फैलता है अपनों में बरबाँट से
हौले-हौले, घूँट-घूँट दिल में उतरती है
जल की सुगंध जैसे मिट्टी वाले माट से
हमने सही है इसलिए हम जानते हैं
ज़िन्दगी सँवरती बुज़ुर्गों की डाँट से

© चरणजीत चरण