सहज ही कह बैठे थे तुम
समझाने के लहजे में-
“रिश्ते को बचाने के लिए
झुक कर माफ़ी मांग लेना
कहीं बेहतर है
रिश्ते के टूट जाने से!
ग़लती न हो
तो भी मांग लेनी चाहिए माफ़ी
कम-से-कम
चलता तो रहता है रिश्ता!”

सुनकर
विरोध किया था मन ने
तुम्हारी इस धारणा का!
फिर गूंजा एक प्रतिप्रश्न
मेरे भीतर-
क्या रिश्ते भी
कॉन्ट्रेक्ट हैं कोई
जिसकी अवधि
बढ़ाई जा सके
एक और स्टैम्प लगाकर?

© संध्या गर्ग