गल्प मोहिनी
आभारी हूँ
तूने सैर कराई मुझको
गुलिस्तान की
परिस्तान की
अद्भुत रेगिस्तान समुन्दर
कभी सिकन्दर
कभी कलन्दर
अली बाबा, सिन्दबाद जहाज़ी
वह तेरा मुल्ला, वह तेरा काज़ी
तिलिस्म अरे शैतानी- अल्लाह
शमशीर-ए-सुलेमानी- अल्लाह
अहा चिराग़-ए-अलादीन
शहज़ादी है पर्दानशीन
बाज़ीगरों के ज़ौहर देखे
सौदागरों के गौहर देखे
चांदनी रात और पेड़ खजूर
नाच रही बसरे की हूर
वल्ले वळुर्बान
मेरी जान!
ऐसी आज पिला दे साक़ी
होश-हवास रहे न बाक़ी!

© जगदीश सविता