हो गये हैं घर अलग
घर के सारे दर अलग

मौत का डर है तो है
ज़िन्दगी के डPhilosophy, र अलग

मुख़्तलिफ़ पहचान को
काम कुछ तो कर अलग

चाहता हूँ सोच लें
मुझको वो पलभर अलग

उनको ही शोहरत मिली
जिनके थे तेवर अलग

सारी दुनिया इक तरफ़
शायरी के घर अलग

रह नहीं सकता है अब
मुझसे वो क्षण भर अलग

तन के ज़ेवर और हैं
मन के हैं ज़ेवर अलग

© प्रवीण शुक्ला