जीनी है ज़िन्दगी तो जियो प्यार की तरह
क्यूँ जी रहे हो तुम इसे तक़रार की तरह

बनना है गर महकते हुए फूल ही बनो
पाँवों में मत चुभो किसी के ख़ार की तरह

मिलना है मुझसे गर तो खुले ज़ेह्न से मिलो
मिलना नहीं है अब मुझे हर बार की तरह

गर चाहते हो तुमको मिलें क़ामयाबियाँ
चलना पड़ेगा वक़्त की रफ़्तार की तरह

जीवन के हर इक पल को जियो धूमधाम से
मत बेवज़ह जियो किसी बीमार की तरह

जिस घर ने पाल-पोस के तुमको बड़ा किया
आंगन को उसके बाँटो मत दीवार की तरह

दोज़ख़ में भी उनको ज़मीं दो गज़ न मिलेगी
माँ-बाप जिन्हें लगने लगें भार की तरह

© प्रवीण शुक्ला