तुमने कहा था-
“अब नहीं करता है मन
मिलने को
या बात करने को।”

समझ गई थी मैं,
इसका कारण
तुम्हारे छिपाने के बावजूद!

जब कभी
बदलने लगता है
चेहरा हमारा,
तब कुछ दिन तो
क़तराने लगते हैं हम
आइने से भी!

हाँ!
मैं तुम्हारा
आईना हूँ।

© संध्या गर्ग