कैसे फ़क़ीर हो तुम
पैसे के पीर हो तुम

रखकर ज़मीर गिरवी
बनते अमीर हो तुम

जो दिल में चुभ रहा है
इक ऐसा तीर हो तुम

आगे न बढ़ सकी जो
ऐसी लकीर हो तुम

कविता में सौदेबाजी
कैसे कबीर हो तुम

दीपक गुप्ता