सहज ही
पूछ लेते हो तुम-
”कैसी हो?”

और देर तक
तलाशती रह जाती हूँ मैं
एक सही उत्तर
तुम्हारे प्रश्न का!

क्या कहूँ-
”ठीक हूँ!
अच्छी हूँ!”

नहीं!
ठीक तो थी ही नहीं मैं
कभी भी!
और अच्छी…
वो भी
कहाँ रह पाई हूँ अब!

तो फिर क्या उत्तर दूँ!
क्या ख़ुद को
ग़लत कह देना
सही उत्तर होगा
तुम्हारे प्रश्न का?

छटपटा कर दोहरा देती हूँ
तुम्हारा ही प्रश्न-
”तुम कैसे हो?”

….और फिर
हर बार
चकित कर जाता है मुझे
तुम्हारा उत्तर-

”कौन मैं?
मैं ठीक….
बिल्कुल ठीक!”

© संध्या गर्ग