मेरे अंदर का कलंदर जानता है
हाल मेरा मुझसे बेहतर जानता है

ज़िंदगी के लाव-लश्कर जानता है
बोझ कितना है मेरा सर जानता है

आसमानों पे नजर रखता है लेकिन
कितना उड़ना है कबूतर जानता है

कुंडली को ताक़ पर रख आइए
कौन अब किसका मुकद्दर जानता है

नींद आती ही नहीं आंखों तलक
करवटों का राज़ बिस्तर जानता है

और क्या उसको जरूरत जानने की
प्रेम के जो ढाई अक्षर जानता है

अपनी छत को आस्मां कहता है वो
अपने हौदे को समंदर जानता है

देवेंद्र गौतम