सिर पर ढोते रहे दुपहरी,कोमल किसलय कुम्हलाये,
कोई बादल आये, आकर उनके सिर पर छांव धरे।

बादल सोचे!किस किसलय पर कितनी देर ठहरना है?
किसे चाहिए धूप किसे छाया से जीवित करना है,
ज्यों ही बादल घर से निकला, घेरा उसे हवाओं ने,
वही हवायें जो बरसों से बैठी थीं यह दाँव धरे।

इसको उसको किसको देखे भरी पड़ीं सारी सीढ़ी,
अपना अपना सीना खोले लेटी है अगली पीढ़ी,
रामानंद खड़ा असमंजस में बेचारा सोच रहा,
आखिर किसे कबीर बना दे आखिर किस पर पाँव धरे।

– ज्ञान प्रकाश आकुल