लुका-छिपी का खेल खेलने में,
मैं उस दिन चोर था।

साफ साफ है याद अभी तक
बचपन की बीती हर घटना
सारे चित्र अभी तक उभरे
रत्ती भर भी हुए न बासी,
कितनी ही धुँधली शामों में
मैंने लुका छिपी खेला था
सौ तक की गिनती गिननी थी
अंजुलि में थी रेत ज़रा सी,
और शर्त यह रेत न फिसले
उसे कहीं पर रख आना था
गिनती गिनकर उसे खोजना
पर सब करना आँखें मीचे,
मैं सरपट गिनती गिनता था
छिप छिप बीच बीच में देखा
एक एक कर सभी छुप गये
दाएं-बाएं ऊपर-नीचे,
धीरे धीरे शान्त हो गया आस पास जो शोर था।
लुका छिपी का खेल खेलने में मैं उस दिन चोर था।

दिखे बीस पच्चीस तीस तक
अपनी जगहें खोज रहे सब
इसके आगे गिनी अकेले
मैंने फिर न किसी को देखा,
पता नहीं वह गिनती थी,या
जीवन के बीतते बरस थे
जाने कहाँ छुप गये सारे
राहुल शोभित मंजू रेखा,
तब से अब तक खोज रहा हूँ
शहर शहर मैं घर घर जाकर
पर न मिले वे मीत न वे दिन
जो बचपन में साथ बिताये,
जाने कहाँ छुपे हैं सारे
मानी मैंने चोरी मानी
पल पल राह निहार रहा हूँ
कोई आकर टीप लगाये,
क्या बचपन की उन शर्तों का धागा यों कमजोर था?
लुकाछिपी का खेल खेलने में मैं उस दिन चोर था।

-ज्ञान प्रकाश आकुल