‘कहानियाँ ही तो हैं
कल्पना का वाग्विलास मात्र’
इतना कहकर तो
अलग नहीं किया जा सकता
अन्तर में गहरे पैठी
वह कचोटती रहती है
मेरी मनीषा को!

कितना भद्दा था मज़ाक
जो लक्ष्मण ने शूर्पनखा के साथ किया
वंशी वाला
जिनकी बहू-बेटियों के साथ
जब जंगल में रास-रचाया करता
तो उनके घर वाले क्या
अफीम खा कर सो रहे होते थे?
ज्रियस द्वारा प्रामिथस को दी गईं यातनाएँ
न्याय था
या नामर्द का गुस्सा?
पाण्डव पुत्र कहे जाने वाले
द्रौपदी के पाँच पतियों का असली जन्मदाता?
यह सब तो अन्दर चलता है
यूँ भी प्रतिदिन के जीवन में
प्रभावित-कुप्रभावित नहीं होता क्या मैं?
क्यों लगता है
जैसे मैं टैण्टेलस हूँ
सर्व सुखों घिरा -मगर असहाय
या जैसे फिर
सहराज़ादी की गुड़िया हूँ मैं
जिसे चाहिए
हर रात नया अफसाना
ओछे मूल्यों की शर-शैया पर लेटा
भीष्म हूँ
उत्तरायण की प्रतीक्षा में
और तुम मेरी जान
तुम तो हो हेलन
एक दैविक बलात्कार की परिणति
तुम्हारे हर चुम्बन में अमरत्व
जिसे पाने के लिए
उतारे जा सकते हैं
समुद्रों पर जहाज़ी बेड़े
लपटों के हवाले किए जा सकते हैं
महानगर
लड़े जा सकते हैं महायुद्ध
रचे जा सकते हैं महाकाव्य!

© जगदीश सविता