रचनाएँ

रत्ती भर परिवर्तन तो कर

कुमार पंकज

समझौते स्वीकार हैं सारे, एक दफ़ा आवेदन तो कर
मैं तो सारा बदल गया, तू रत्ती भर परिवर्तन तो कर

चल तू बतला धीरे-धीरे चलूँ, या बिल्कुल रुकना होगा
ऐसा कर तू निश्चित कर ले, मुझको कितना झुकना होगा
मेरा विश्लेषण कर ले, पर ख़ुद का भी मूल्यांकन तो कर

सच ये है तेरे तरकश में शक्तिशाली तर्क बहुत हैं
लेकिन पगली स्वाभिमान और अभिमान में फ़र्क़ बहुत हैं
ग़लती चाहे जिसकी भी है, अब कोई संशोधन कर ले

उनको चल मैं काट रहा हूँ, जो पीड़ा सींची है मैंने
मैं ख़ुद बाहर आ जाता हूँ, जो रेखा खींची है मैंने
तू भी अपनी हठ रेखा का, थोड़ा-सा उल्लंघन तो कर

मेरी पलकें ख़ारी हैं तो छुप-छुप कर तू भी रोती है
ये भी सच है झुक जाने में पीड़ा तो काफ़ी होती है
अच्छा झुक मत, पर झुकने का थोड़ा-सा प्रदर्शन तो कर

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चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी

चिराग़ जैन

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी
कुछ मुंडेरों के मुक़द्दर में चमेली आ गयी

पैर भी सुस्ता लिये, आँखों ने भी दम ले लिया
ज़िंदगी की राह में, दिल की हवेली आ गई

झाँकता है हर कोई ऐसे दिल-ए-नाशाद में
जैसे आंगन में कोई दुल्हन नवेली आ गई

बोझ कंधों का उतर कर गिर गया जाने कहाँ
जब मेरे सिर पे बुज़ुर्गों की हथेली आ गई

तीरगी का ख़ौफ़, सन्नाटे की दहशत थी मगर
इक किरण सूरज की धरती पर अकेली आ गयी

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एक स्वर मेरा मिला लो!

सोहनलाल द्विवेदी

वंदना के इन स्वरों में
एक स्वर मेरा मिला लो!

राग में जब मत्त झूलो
तो कभी माँ को न भूलो
अर्चना के रत्नकण में
एक कण मेरा मिला लो!

जब हृदय का तार बोले
शृंखला के बंद खोले
हों जहाँ बलि शीश अगणित
एक शिर मेरा मिला लो!

वंदना के इन स्वरों में
एक स्वर मेरा मिला लो!

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हिमालय

सोहनलाल द्विवेदी

युग-युग से है अपने पथ पर देखो कैसा खड़ा हिमालय!
डिगता कभी न अपने प्रण से रहता प्रण पर अड़ा हिमालय!

जो जो भी बाधाएँ आईं उन सब से ही लड़ा हिमालय,
इसीलिए तो दुनिया भर में हुआ सभी से बड़ा हिमालय!

अगर न करता काम कभी कुछ रहता हरदम पड़ा हिमालय
तो भारत के शीश चमकता नहीं मुकुट–सा जड़ा हिमालय!

खड़ा हिमालय बता रहा है डरो न आंधी-पानी में,
खड़े रहो अपने पथ पर सब कठिनाई तूफ़ानी में!

डिगो न अपने प्रण से तो, सब कुछ पा सकते हो प्यारे!
तुम भी ऊँचे हो सकते हो छू सकते नभ के तारे!!

अचल रहा जो अपने पथ पर लाख मुसीबत आने में,
मिली सफलता जग में उसको जीने में, मर जाने में!

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नदी तुम स्त्री

हर्षवर्द्धन आर्य

(एक)

उतर रहा हूँ मैं
तुम्हारे भीतर
गहरा, और गहरा
अन्दर, और अन्दर
तुम्हारी अठखेलियों संग इठलाता
अंजुरी भर-भर
ओटता आनन्द
सराबोर… पोर-पोर
ख़ुशी से
सोचता हूँ आकर बाहर
तुम…
…नदी हो
या स्त्री!

(दो)

स्त्री है
नदी
-नहीं…
यूँ तो वह स्त्री ही है
या फिर कहूँ
नदी है स्त्री…
सरस… प्रवाहित…,
देती तब सर्वस्व
लेती तब सर्वस्व॥

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ख़्वाब की किरचें

सुधीर मौर्या ‘सुधीर’

वक़्त ने
मेरी बाँह थाम कर
मेरी हथेली पर
अश्क़ के
दो क़तरे बिखेर दिए।
मेरे सवाल पर बोला
ये अश्क़ नहीं
बिखरे ख़्वाब की किरचे हैं
संभाल कर रखो
तुम्हें ये याद दिलाएंगे
कि मुफ़लिस आँखों में ख़्वाब
सजाया नहीं करते।

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तुम निश्चिन्त रहना

किशन सरोज

कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र, तुम निश्चिन्त रहना

धुंध डूबी घाटियों के इंद्रधनु तुम
छू गए नत भाल पर्वत हो गया मन
बूंद भर जल बन गया पूरा समंदर
पा तुम्हारा दुख तथागत हो गया मन
अश्रुजन्मा गीत कमलों से सुवासित
यह नदी होगी नहीं अपवित्र, तुम निश्चिन्त रहना

दूर हूँ तुमसे न अब बातें उठेंगी
मैं स्वयं रंगीन दर्पण तोड़ आया
वह नगर, वह राजपथ, वे चौंक-गलियाँ
हाथ अंतिम बार सबको जोड़ आया
थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित
छोड़ आया वे पुराने मित्र, तुम निश्चिंत रहना

लो विसर्जन आज बासंती छुअन का
साथ बीने सीप-शंखों का विसर्जन
गुँथ न पाए कनुप्रिया के कुंतलों में
उन अभागे मोरपंखों का विसर्जन
उस कथा का जो न हो पाई प्रकाशित
मर चुका है एक-एक चरित्र, तुम निश्चिंत रहना

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वेदना

विवेक मिश्र

वह सालों-साल
रात के तीसरे पहर तक
उनींदी पलकें
पीले बल्ब पर सेंकता होगा

दफ़्तर के दमघोंट कमरे में
फ़ाइलों के भँवर में
डूबने से पहले
सिर उतार कर रख देता होगा
…अक्षरों की गोद में

सालों-साल
पीली पर्चियों पर
लिख कर दो अक्षर
सूंघता होगा कविता को
संजीवनी-सा।
कैसे बचाता होगा
ख़ुद में उसे
या उस में ख़ुद को

विचरता होगा दिन-रात
काग़ज़ पर डूबती-उतराती
स्याह पगडण्डियों पर
गुज़रती होंगी
कानों को छूती
धड़धड़ाती गाड़ियाँ
भा भा, षा षा, व्या व्या,
क क, र र, ण ण
का शोर करतीं,
कविता का व्याकरण पूछतीं

तब उपजी होगी
एक कविता
जो लिली जैसी नहीं थी
न ही थी नागफ़नी-सी

तुम कैसे कर पाओगे
उसका नामकरण
उसे एक बार पढ़ कर
या एक बार सुन कर

उन्हीं कविताओं में
कहीं बैठा होगा वह भी
अपना घर बनाए
बिना अपने नाम की
तख्ती लगाए

तुम कैसे दे पाओगे
दस्तक
उसके दरवाज़े पर
बस अख़बार की तरह
उसे एक बार पढ़ कर
या किसी समाचार-सा
एक बार सुनकर
… बस एक बार सुन कर।

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पत्नी, प्रेम और पीड़ा

हर्षवर्द्धन आर्य

(एक)

तुम्हारी पीठ का दर्द
सालता रहा मुझे
रात भर
मैं सहलाता रहा
(तुम्हारी पीठ)
तुम्हारे सोने तक
बदलता रहा करवटें
सुबह होने तक।

(दो)

चांद जब मुस्कुराता
कितना सुहाता है
पर कम्बख्त बादल…
तुम्हारे सिरदर्द होने पर
माथे पर लिपटी पट्टी-सा
कितना सताता है।

(तीन)

मचलती-बलखाती
चंचल हवा
कनबतिया कहती
छूती है- तो झंकृत हो जाता हूँ
मानो छू लिया हो
तुमने
चुपके से आकर।

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गर्लफ्रेंड

सुधीर मौर्या ‘सुधीर’

पार्टी में
अपनी गर्लफ्रेंड के साथ आये
मेरे दोस्तों ने
जब मुझसे
मेरी गर्लफ्रेंड के बारे में पूछा
तो मैंने
पर्स से
तुम्हारी तस्वीर
निकाल कर दिखा दी

आज पूरी रात
मुझे
नींद न आई
आज
मैंने
किसी और की
बीवी को
अपनी गर्लफ्रेंड बताया।

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भारत की घड़ी

अरुण जैमिनी

एक आदमी ने
धरती से किया प्रस्थान
और यमराज के कक्ष में
घड़ियाँ-ही-घड़ियाँ देखकर
रह गया हैरान

हर देश की अलग घड़ी थी
कोई छोटी कोई बड़ी थी
कोई दौड़ रही थी कोई बन्द
कोई तेज़ थी, कोई मन्द

उनकी अलग-अलग रफ़्तार देखकर
आदमी चकराया
कारण पूछा तो यमराज ने बताया
हर घड़ी की उसी हिसाब से है रफ़्तार
जिस हिसाब से हो रहा है
उस देश में भ्रष्टाचार

आदमी ने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई
लेकिन भारत की घड़ी कहीं भी
नज़र नहीं आई
आदमी मुस्कुराया
यमराज के पास गया
और उसके कान में फुसफुसाया
-भारत वाले भ्रष्टाचार
यहाँ भी ले आए
सच-सच बताओ
भारत की घड़ी न रखने के लिये
कितने पैसे खाए

यमराज बोले-
बेटे, तेरे शक़ की सुईं
तो बिना बात उछल रही है
मेरे बैड रूम में जाकर देखो
पंखे की जगह
भारत की घड़ी चल रही है

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हिलता रहा मन

किशन सरोज

धर गए मेहंदी रचे दो हाथ जल में दीप
जन्म-जन्मों ताल-सा हिलता रहा मन

बाँचते हम रह गए अंतर्कथा
स्वर्णकेशा गीत वधुओं की व्यथा
ले गया चुन कर कँवल कोई हठी युवराज
देर तक शैवाल-सा हिलता रहा मन

जंगलों का दुःख तटों की त्रासदी
भूल सुख से सो गयी कोई नदी
थक गयी लड़ती हवाओं से अभागी नाव
और झीने पाल-सा हिलता रहा मन

तुम गए क्या जग हुआ अंधा कुआँ
रेल छूटी रह गया केवल धुआँ
गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात
हाथ के रूमाल-सा हिलता रहा मन

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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताए कि वो शोख़े-तुंदख़ू क्या है

ये रश्क़ है कि वो होता है हमसुख़न हमसे
वगरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी ज़ैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज
सिवाय बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये कि आरज़ू क्या है

बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगरना शहर में ‘ग़ालिब’ की आबरू क्या है

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ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन-सा दयार है

अखलाक़ मौहम्मद ख़ान ‘शहरयार’

ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन-सा दयार है
हद्द-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है

ये किस मुकाम पर हयात मुझको ले के आ गई
न बस ख़ुशी पे है जहाँ, न ग़म पे इख़्तियार है

तमाम उम्र का हिसाब मांगती है ज़िन्दगी
ये मेरा दिल कहे तो क्या, ये ख़ुद से शर्मसार है

बुला रहा क्या कोई मुझको चिलमनों के उस तरफ़
मेरे लिये भी क्या कोई उदास बेक़रार है

न जिसकी शक्ल है कोई, न जिसका नाम है कोई
इक ऐसी शै का क्यों हमें अज़ल से इंतज़ार है

फ़िल्म : उमराव जान (1981)
संगीतकार : ख़ैयाम
स्वर : आशा भोंसले

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इन्तज़ार

हर्षवर्द्धन आर्य

मेरा हृदय
…सीप
उसमें सहेजे
प्रीत के मोती
मेरी हंसिनी-
तुम्हें चुगाना चाहता हूँ

इन सफेद काग़ज़ों पर
छितराई रौशनाई से
उभरे शब्द
जिन्हें
पढ़ रही हो तुम वर्षों बाद
ये मात्र प्रेम कविताएँ नहीं
मेरे हृदय का लहू हैं
जो बिखर गया है
झक्क सफेद
काग़ज़ पर
सूख चुका
तुम्हारे इन्तज़ार में।

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सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान-सा क्यूँ है

अखलाक़ मौहम्मद ख़ान ‘शहरयार’

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान-सा क्यूँ है
इस शहर में हर शख़्स परेशान-सा क्यूँ है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान-सा क्यूँ है

तन्हाई की ये कौन-सी मन्ज़िल है रफ़ीक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बियाबान-सा क्यूँ है

हमने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की
वो ज़ूद-ए-पशेमान, पशेमान-सा क्यूँ है

क्या कोई नई बात नज़र आती है हममें
आईना हमें देख के हैरान-सा क्यूँ है

फ़िल्म : गमन (1978)
संगीतकार : जयदेव
स्वर : सुरेश वाडकर

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देहरी की क़िस्मत

चिराग़ जैन

वो, जिनके घर मेहमानों का आना-जाना होता है
उनको घर का हर कमरा ,हर रोज़ सजाना होता है
जिस देहरी की क़िस्मत में स्वागत या वंदनवार न हों
उस चौखट के भीतर केवल इक तहख़ाना होता है

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ग़ुलाब हमारे पास नहीं

किशन सरोज

नागफनी आँचल में बांध सको तो आना
धागों बिंधे ग़ुलाब हमारे पास नहीं

हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोये, आधे जागे
थोड़े सुख के लिये उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे
कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित
इसका सही हिसाब, हमारे पास नहीं

हमने व्यथा अनमनी बेची
तन की ज्योति कंचनी बेची
कुछ न मिला तो अंधियारों को
मिट्टी मोल चांदनी बेची
गीत रचे जो हमने उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं

झिलमिल करतीं मधुशालाएँ
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ
घड़ी-घड़ी हर घूँट-घूँट हम
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ
पीकर जिसको चित्र तुम्हारा धुंधला जाए
इतनी कड़ी शराब, हमारे पास नहीं

आखर-आखर दीपक बाले
खोले हमने मन के ताले
तुम बिन हमें न भाए पल भर
अभिनन्दन के शाल-दुशाले
अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, ये मत पूछो
कोई अभी जवाब, हमारे पास नहीं

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हद्द-ए-निगाह तक ये ज़मीं है सियाह फिर

अखलाक़ मौहम्मद ख़ान ‘शहरयार’

हद्द-ए-निगाह तक ये ज़मीं है सियाह फिर
निकली है जुगनुओं की भटकती सिपाह फिर

होंठों पे आ रहा है कोई नाम बार-बार
सन्नाटों के तिलिस्म को तोड़ेगी आह फिर

पिछले सफ़र की गर्द को दामन से झाड़ दो
आवाज़ दे रही है कोई सूनी राह फिर

बेरंग आसमान को देखेगी कब तलक
मंज़र नया तलाश करेगी निगाह फिर

ढीली हुई गिरफ़्त जुनूँ की कि जल उठा
ताक़-ए-हवस में कोई चराग़-ए-गुनाह फिर

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एहसास

सुधीर सागर

गाँव में
ठाकुर का कुआँ
एहसास
दलित होने का।

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