रचनाएँ

Category: अम्बरीष श्रीवास्तव

इस अंतर में प्रभु रहते हैं


खुली खिड़कियॉ


सत्संग


इन्ही आँखों में सागर है


दोस्ती में दिल खुला हो


तीर-तुणीर चलावत तो हैं


नज़ारा याद आता है


सारी दुनिया देखेगी


जय जवान


दोहे की महिमा अगम


दिल तक तो अब ये हमारा नहीं


बचपन के दिन


जय-जय राम


दोधारी तलवार से