रचनाएँ

Category: प्रवीण शुक्ल

सागर का उपहास


एक नज़र में प्यार


छोड़ गाँव का घर


बच्चे अब हुशियार


होते ख़ुश माँ-बाप


बाबुल का रोग


बस इतनी रफ़्तार


एक क़दम की चूक से


जीवन है वो रेल


ग़ज़ब समय का फेर


सपने में भी दीखता अब मोबाइल फोन


गौतम-सा सन्यास


जैसा उसका संग


मेरे कुछ जज़्बात


उसी तरह के रंग


जो काँटों के पास थे


बदला-बदला लग रहा


फ़रेबों पर टिका तेरा हुनर बस चार दिन का है


प्यार के गाँव में


लुट गये ख़ुद बचाई है यूँ दोस्ती