रचनाएँ

Category: कनकप्रभा

चलते-चलते थके पथिक जो


क्या कभी भी छिप सका है


क्या बताऊँ मैं स्वयं को


विश्व-तट पर हो रही क्यों मौन मानवता?


मेरी सब चाहों ने अब सन्यास ले लिया


ऐसा मन्त्र सिखाओ भन्ते!