रचनाएँ

Category: कृष्णानंद चौबे

आपका मक़सद पुराना है मगर खंज़र नया


बातें


इधर भटके, उधर भटके, भटक कर लौट आये हैं


ज़िन्दगी के फलसफ़े में अब न उलझाना मुझे


डूबते वक्त क़िसी का तो सहारा होता


दुनिया की लिये ख़ैर-ख़बर डूब रहा है


क्या ये मुमक़िन नहीं बहार आये


पूछिये मत क्यों नहीं आराम आया रात भर


हमारे चेहरे पे ग़म भी नहीं, ख़ुशी भी नहीं


मंदिरों में आप मनचाहे भजन गाया करें