रचनाएँ

Category: निश्तर खानक़ाही

कितना बेपरवा था वो


कोई न ठहरे बीच में


मंज़र नहीं मिला


दर्द का रिश्ता अज़ीज़ था


सो रहा बेख़्वाब आँख


सूरज बिखर गया तो क्या


दोस्ती