रचनाएँ

Category: मुक्तक

देहरी की क़िस्मत


आँखें भर आईं


मीडिया : एक चेहरा ये भी


ये बम रखने का काम


तीर-तुणीर चलावत तो हैं


वतन के नाम


बादलों से सलाम लेता हूँ


जिल्द बंधाने में कटी


यही बाक़ी निशां होगा


मरहम


सूर्य ग्रहण


किसी से दिल नहीं मिलता


ख़तरे में इस्लाम हो नहीं सकता


ख़ुश्बू की खेती


हिंदी


चिराग़ की लौ में कमी नहीं आती


बहुत कम चाहा


बम नहीं समझता है


दुनिया बदल जाती है


तेरी गोदी-सी गरमाहट