रचनाएँ

एक स्वर मेरा मिला लो!

सोहनलाल द्विवेदी

वंदना के इन स्वरों में
एक स्वर मेरा मिला लो!

राग में जब मत्त झूलो
तो कभी माँ को न भूलो
अर्चना के रत्नकण में
एक कण मेरा मिला लो!

जब हृदय का तार बोले
शृंखला के बंद खोले
हों जहाँ बलि शीश अगणित
एक शिर मेरा मिला लो!

वंदना के इन स्वरों में
एक स्वर मेरा मिला लो!

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हिमालय

सोहनलाल द्विवेदी

युग-युग से है अपने पथ पर देखो कैसा खड़ा हिमालय!
डिगता कभी न अपने प्रण से रहता प्रण पर अड़ा हिमालय!

जो जो भी बाधाएँ आईं उन सब से ही लड़ा हिमालय,
इसीलिए तो दुनिया भर में हुआ सभी से बड़ा हिमालय!

अगर न करता काम कभी कुछ रहता हरदम पड़ा हिमालय
तो भारत के शीश चमकता नहीं मुकुट–सा जड़ा हिमालय!

खड़ा हिमालय बता रहा है डरो न आंधी-पानी में,
खड़े रहो अपने पथ पर सब कठिनाई तूफ़ानी में!

डिगो न अपने प्रण से तो, सब कुछ पा सकते हो प्यारे!
तुम भी ऊँचे हो सकते हो छू सकते नभ के तारे!!

अचल रहा जो अपने पथ पर लाख मुसीबत आने में,
मिली सफलता जग में उसको जीने में, मर जाने में!

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आया वसंत आया वसंत

सोहनलाल द्विवेदी

आया वसंत, आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत

सरसों खेतों में उठी फूल
बौरे आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नए फूल
पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत, आया वसंत

लेकर सुगंध बह रहा पवन
हरियाली छाई है बन-बन
सुंदर लगता है घर-आँगन
है आज मधुर सब दिग्-दिगंत
आया वसंत, आया वसंत

भौंरे गाते हैं नया गान
कोकिला छेड़ती कुहू तान
हैं सब जीवों के सुखी प्राण
इस सुख का हो अब नही अंत
घर-घर में छाए नित वसंत
आया वसंत, आया वसंत

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आज वासन्ती उषा है

सोहनलाल द्विवेदी

आज कण-कण कनक कुंदन
आज तृण-तृण हरित चंदन
आज क्षण-क्षण चरण वंदन
विनय अनुनय लालसा है
आज वासन्ती उषा है
अलि रचो छंद

आज आई मधुर बेला
अब करो मत निठुर खेला
मिलन का हो मधुर मेला
आज अधरों में तृषा है
आज वासंती उषा है
अलि रचो छंद

मधु के मधु ऋतु के सौरभ के
उल्लास भरे अवनी नभ के
जड़-जीवन का हिम पिघल चले
हो स्वर्ण भरा प्रतिचरण मंद
अलि रचो छंद

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बढ़े चलो!

सोहनलाल द्विवेदी

न हाथ एक शस्त्र हो
न हाथ एक अस्त्र हो
न अन्न वीर वस्त्र हो
हटो नहीं, डरो नहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

रहे समक्ष हिम-शिखर
तुम्हारा प्रण उठे निखर
भले ही जाए जन बिखर
रुको नहीं, झुको नहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

घटा घिरी अटूट हो
अधर में कालकूट हो
वही सुधा का घूँट हो
जिये चलो, मरे चलो
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

गगन उगलता आग हो
छिड़ा मरण का राग हो
लहू का अपने फाग हो
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

चलो नई मिसाल हो
जलो नई मशाल हो
बढ़ो नया क़माल हो
झुको नहीं, रुको नहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

अशेष रक्त तोल दो
स्वतन्त्रता का मोल दो
कड़ी युगों की खोल दो
डरो नहीं, मरो नहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

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