रचनाएँ

कारण

आचार्य महाप्रज्ञ

अग्नि जलती है
पर इसलिए नहीं कि
पतंगा उसमें गिर
जल लाए
वह जलती है
इसलिए कि
उसे देख
हर कोई संभल जाए

अग्नि जलती है
पर इसलिए नहीं कि
नवनीत
उसके पास आ
पिघल जाए
वह जलती है
इसलिए कि
सुकुमार को
जड़ता न
छल जाए

अग्नि जलती है
पर इसलिए नहीं कि
वह सब कुछ निगल जाए
वह जलती है
इसलिए कि
चैतन्य में से
धुऑं निकल जाए

अग्नि जलती है
पर इसलिए नहीं कि
पानी भी उबल जाए
वह जलती है
इसलिए कि
जल
जलन बन
ऑंखों में से
ढल जाए

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