रचनाएँ

विश्व-तट पर हो रही क्यों मौन मानवता?

कनकप्रभा

विश्व-तट पर हो रही क्यों मौन मानवता?

नृत्य जो दिखला रही दिन-रात भूतल पर
भीति पैदा कर रही है रूप भय का धर
छा रही संसार पर क्यों आज दानवता?

झूठ भी अब सत्य की ले ओट पलता है
न्याय की सोपान पर अन्याय खलता है
सो रही क्यों सुस्त होकर आज पावनता?

मूल्य जीवन के चटकते जा रहे जब से
बढ़ रही युग की समस्याएँ सभी तब से
शान्ति से आनन्द से है दूर यह जनता

Leave a Reply