क्या कभी भी छिप सका है

क्या कभी भी छिप सका है

कनकप्रभा

क्या कभी भी छिप सका है
कृत स्वयं का पाप?

अनल जलकर कह रहा है देख लो यह धूम उद्भव
सूर्य की उत्तप्त किरणों से कभी क्या शीत संभव
जलन जल की कह रही है
स्वयं की ही भाप

क्रोध-दावानल जला देता विमल-व्यवहार जग का
भेद की रेखा बनाकर तोड़ देता स्नेह सबका
हो भले सामर्थ्य पर है
निहित उसमें शाप

चमकती चपला गगन में कर रही अधिकार अपना
किन्तु छिपना देखकर तो लग रहा है मात्र सपना
बादलों के व्यूह में वह
पा रही सन्ताप

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