रचनाएँ

चलते-चलते थके पथिक जो

कनकप्रभा

चलते-चलते थके पथिक जो
उन्हें नीड़ का पंथ दिखाएँ
गहराया है तिमिर जहाँ पर
वहाँ शीघ्र ही दीप जलाएँ

आँखों में सपने हैं सुन्दर
नहीं सत्य से रिश्ता जोड़ा
मंज़िल से विपरीत दिशा में
दौड़ रहा है मन का घोड़ा
उजड़े जीवन के खेतों में
अरमानों की पौध उगाएँ

चाह उजाला पाने की पर
तम की चादर बिछी सामने
खोज रहे हैं सबल सहारा
जीवन की पतवार थामने
घाव हरे जो अन्तर्मन के
उन पर मरहम आज लगाएँ

थी उमंग उर में हँसने की
किन्तु आँसुओं ने आ घेरा
जीवन की पोथी लिखनी थी
लिखा गया पर एक न पैरा
लेखन में अवरोध बनी उन
दीवारों को तोड़ गिराएँ

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