चुप्पियाँ तोड़ना जरुरी है

चुप्पियाँ तोड़ना जरुरी है

दिनेश रघुवंशी

चुप्पियाँ तोड़ना ज़रुरी है
लब पे कोई सदा ज़रुरी है

आइना हमसे आज कहने लगा
ख़ुद से भी राब्ता ज़रुरी है

हमसे कोई ख़फ़ा-सा लगता है
कुछ न कुछ तो हुआ ज़रुरी है

ज़िंदगी ही हसीन हो जाए
इक तुम्हारी रज़ा ज़रुरी है

अब दवा का असर नहीं होगा
अब किसी की दुआ ज़रुरी है

2 Responses to “चुप्पियाँ तोड़ना जरुरी है”

  1. 1
    अविनाश वाचस्‍पति Says:

    दिनेश भाई ने जो कहा है सच सच कहा है, सच के सिवाय कुछ नहीं कहा है। चुप्पियां न रहें तो जीवन जीवन लगता है, नहीं तो सिर्फ घना वन लगता है।

  2. 2
    वीरेंद्र रघुवंशी Says:

    “ज़िंदगी ही हसीन हो जाए
    इक तुम्हारी रज़ा ज़रुरी है” मुझे नहीं पता भाई साब आपके मन में ये किस के लिए उद्घटित हुई हैं पर मैं यही शव्द मेरे प्रभु श्री राम से कहना चाहता हूँ

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