विवाह-निमंत्रण

विवाह-निमंत्रण

कुलदीप ‘आज़ाद’

तुम्हारी यही बात
कभी मुझे तुमसे दूर नहीं जाने देती
तुम कभी ना नहीं कहती हो ..
भले ही तुम्हारी हाँ सुनने के लिए
लग जाते हैं बरसों-बरस …

याद है, हमने कितने सपने देखे थे-
कि ऐसा होगा हमारा ‘विवाह-निमंत्रण’
नहीं नहीं! वैसा होगा
मुझे स्वास्तिक और तुमे गणेशजी पसंद थे
हमेशा से ‘निमंत्रण-पत्र’ के मुख्य आवरण’ पर

आज की डाक में
एक निमंत्रण मुझे भी मिला है प्रिये …..
जिसमे वधू के स्थान पर तुम्हारा नाम है
और नाम मेरा भी लिखा है
लेकिन….
गणेश जी की आकृति के ठीक नीचे
हल्दी रोली से बने स्वास्तिक के साथ
‘सपरिवार’

One Response to “विवाह-निमंत्रण”

  1. 1
    Kanhaiya Says:

    बहुत संवेदनशील रचना है ! जब ऐसा होता है तो वास्तव में मन के तार-तार टूट जाते हैं. !!!!!!!!!

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