पिया अश्रु पूर दिए रस्ते

पिया अश्रु पूर दिए रस्ते

गीतिका ‘वेदिका’

मैंने पीहर की राह धरी
पिया अश्रु पूर दिए रस्ते
हिलके-सिसके नदियाँ भर-भर
फिर-फिर से बाँहों में कसते…!

हाय कितने सजना भोले
पल-पल हँस के पल-पल रो ले
चुप-चुप रह के पलकें खोले
छन बैरी वियोग डसते
फिर-फिर से बाँहों में कसते…!

वापस आना कह हाथ जोड़
ये विनती देती है झंझोड़
मैं देश पिया के लौट चली
पिया भर उर कण्ठ लिए हँसते
फिर-फिर से बाँहों में कसते…!

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