रचनाएँ

चले गए हा! जीव से प्रान

गीतिका ‘वेदिका’

स्वागत में हम थे आतुर
अधरों पर लेकर मुस्कान
जाने कब और कैसे ईश्वर
चले गए हा! जीव से प्रान

शत्-शत् स्वप्न सजा नैनों में
मधुरस घोला था बैनों में
लेकिन श्रम यह शून्य हो गया
धुल धूसरित सब धन-धान
चले गए हा! जीव से प्रान

क्या प्रकृति के मन को भाया
सुख-सुख से कैसा भरमाया
पहले दृष्टि-दया दिखलाई
बड़ा कुटिल फिर हुआ विधान
चले गए हा! जीव से प्रान

3 Responses to “चले गए हा! जीव से प्रान”

  1. 1
    madhav Says:

    nice

  2. 2
    nirmla.kapila Says:

    dil ko choo gayee aapakee kavitaa| shubhakaamanaayen

  3. 3
    आजाद Says:

    वा क्या लिखा हे इस लेखक का पूरा विवरण तो देते
    काफी सुन्दर रचना हे

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