रचनाएँ

जिनके हिस्से अपनी माँ की लोरियाँ आती नहीं

दिनेश रघुवंशी

जिनके हिस्से अपनी माँ की लोरियाँ आती नहीं
उनके सपनों में भी परियाँ, तितलियाँ आती नहीं

नींव पर जो स्वार्थ की चुनते गये, बुनते गये
ऐसे रिश्तों में कभी नज़दीकियाँ आती नहीं

मेरी इन आँखों के आँसू जानते हैं बात ये
मेरी पलकों तक किसी की उंगलियाँ आती नहीं

एक मुद्दत से मुझे तुम याद करते हो कहाँ
एक मुद्दत से मुझे अब हिचकियाँ आती नहीं

कौन-सा है घर जहाँ पर लोरियाँ गूंजी न हों
कौन-सा है घर जहाँ से सिसकियाँ आती नहीं

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2 Responses to “जिनके हिस्से अपनी माँ की लोरियाँ आती नहीं”

  1. 1
    राजीव भरोल Says:

    बहुत ही अच्छी ग़ज़ल. मतला तो लाजवाब है.

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  2. 2
    इस्मत ज़ैदी Says:

    बहुत उम्दा मतले के साथ अच्छी ग़ज़ल
    बहुत ख़ूब !

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