जीते रहो!!!

जीते रहो!!!

गीतिका ‘वेदिका’

हे सहोदर!
तुम वही ना
जो रहे उसी उदर में
जिसमें कि मैं
उसी पदार्थ से पोषित
जिससे कि मैं
फिर क्यों नहीं कोमल भावनाएँ तुम्हारी
जैसे कि मेरी,
फिर क्यों कठोर शब्द
क्यों मैं पल-पल आहत तेरे बोलों से
क्यों जमता मेरा दौड़ता लहू
क्यों ख़त्म होतीं मेरी ख़ुशियाँ
तेरे उपालम्बों से
क्यों हर वक़्त मुझे नीचा दिखाने की होड़,
जबकि मैं तेरी प्रतिस्पर्धी तो नहीं
तब भी चाक़ होता हृदय जब
तेरे इस व्यवहार से
माता-पिता भी तेरे
क्यों नहीं मेरे
रहते तेरे ही पाले में

हे! भाई!
राखी के अवसर आते ही
आगे करते हाथ केवल इस हेतु
कि कोई तुम्हें ताना न दे
कि तेरी सूनी कलाई।
झुकते तो नहीं कभी
ज़िद्दी, हठीले और छोटे उम्र में तुम
फिर भी ये आशीर्वचन तेरे ही लिए
जीते रहो!!!

2 Responses to “जीते रहो!!!”

  1. 1
    Dinesh Dhyani Says:

    फिर क्यों नहीं कोमल भावनाएँ तुम्हारी
    जैसे कि मेरी,
    फिर क्यों कठोर शब्द
    क्यों मैं पल-पल आहत तेरे बोलों से

  2. 2
    Dinesh Dhyani Says:

    फिर क्यों नहीं कोमल भावनाएँ तुम्हारी
    जैसे कि मेरी,
    फिर क्यों कठोर शब्द
    क्यों मैं पल-पल आहत तेरे बोलों से, Bahut sundar….

Leave a Reply