रचनाएँ

नदी तुम स्त्री

हर्षवर्द्धन आर्य

(एक)

उतर रहा हूँ मैं
तुम्हारे भीतर
गहरा, और गहरा
अन्दर, और अन्दर
तुम्हारी अठखेलियों संग इठलाता
अंजुरी भर-भर
ओटता आनन्द
सराबोर… पोर-पोर
ख़ुशी से
सोचता हूँ आकर बाहर
तुम…
…नदी हो
या स्त्री!

(दो)

स्त्री है
नदी
-नहीं…
यूँ तो वह स्त्री ही है
या फिर कहूँ
नदी है स्त्री…
सरस… प्रवाहित…,
देती तब सर्वस्व
लेती तब सर्वस्व॥

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