मेरे बढ़ने से जल गये हो तुम

मेरे बढ़ने से जल गये हो तुम

उर्मिलेश शंखधर

मेरे बढ़ने से जल गये हो तुम
दोस्त कितने बदल गये हो तुम

मेरी शह और मात मुझको ही
चाल ये कैसी चल गये हो तुम

अब तो शब्दों को ढो रहा जीवन
अर्थ सारे निगल गये हो तुम

राख से जो न ढके न दीख सके
उन अँगारो में ढल गये हो तुम

पास रह कर भी ऐसा लगता है
दूर कितने निकल गये हो तुम

भेद अपना न कह सके मुझसे
जैसे दर्पण को छल गये हो तुम

यह ग़ज़ल “उर्मिलेश” की गाकर
दर्द दिल का उगल गये हो तुम

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