रचनाएँ

रात की रागिनी

राजेश कुमार दुबे

निर्निमेषित नयन देखते हैं जिन्हें
रात की रागिनी वह चली आ रही
है धवल चाँदनी में नलिन-सी खिली
रूप की माधुरी है चली आ रही

मोतियों की बनी कान की वल्लरी
झिलमिलाती हुई रोम हरषा रही
नील घन सेज से वह अमर बेल-सी
है रजत धार बनकर चली आ रही

कांत रक्तिम अधर हैं छलकते लहू
स्पर्श कर श्यामली केश सहला रहे
रूप-लावण्य तन में समेटे हुए
वह यौवन की सरिता चली आ रही

श्वास के ताल पर नृत्यरत दो कमल
मेघ की दामिनी से दमकते रहे
नेत्र में लाल डोरे लिए मल्लिका
मद भरी आँख से सोम छलका रही

संकुचित हो झुकाए नयन मालिनी
धीरे-धीरे सहम कर कदम रख रही
दुग्ध सी पिंडली गात कचनार सी
लाजवंती सिमट कर बनी जा रही

अनछुए पुष्प जैसी है कमनीयता
कामिनी-यामिनी मध्य लहरा रही
छेड़कर ताल की सुमधुर रागिनी
शांत निर्झर बनी वह बही आ रही

निर्निमेषित नयन देखते हैं जिन्हें
रात की रागिनी है चली आ रही

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