रचनाएँ

मरती हू मैं हर दिन

ना दिन मे न रात मे
ना घर की चार दीवार मे
ना देश मे ना कानून मे
ना मा के उस आँचल मे

नही मिली नही मिली
मुझे सुरक्षा नही मिली

क्या बेटी होना पाप है
मा बाप के लिए अभिशाप है

अपने सपनो से मैं लड़ती हू
हर आदमी से मैं दरी हू

कही दुनिया मे ना आने दिया
कही पैदा होने पर ठुकरा दिया

यह सच बता दो सबको
कुछ कर दिखाऊंगी दुनिया को

मैं ही माँ मैं ही बेटी मैं ही बहन का रूप हू
मेरी ममता मेरा प्यार मैं ही छाव ओर धूल हू

मरती हू मैं हर दिन
पर सोचलो दुनिया वालो
क्या चला पाओगे
ये जहां मेरे बिन

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