समदर्शी ही होता दर्पण

समदर्शी ही होता दर्पण

धनसिंह खोबा ‘सुधाकर’

हर हाल में समदर्शी ही होता दर्पण
दर्शक को ही अपने में समोता दर्पण
व्यवहार है सबसे ही निराला उसका
अपनत्व न अपना कभी खोता दर्पण

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