मांगता कैसे

मांगता कैसे

कुलदीप आज़ाद

कई सवाल तेरे थे, कई सवाल मेरे थे
गुज़रते वक़्त से जवाब, मांगता कैसे

कई रातें हमने जागकर जो काटी थीं
रतजगी आँखों से ख़्वाब मांगता कैसे

मुझे पता था ज़माना ये दिन दिखाएगा
पर मुहब्बत का हिसाब मांगता कैसे

उनके किरदार का अहम हिस्सा है
उनके चेहरे का वो नक़ाब मांगता कैसे

उनकी ज़िंदगी के पन्नों में महक घोलता है
वो सुखा गुलाब, मांगता कैसे

सुबह से शाम तक सिर्फ़ अपने चर्चे थे
छिपाने को लिबास मांगता कैसे

तेरे लम्स की मदहोशी ही नहीं जाती
साक़ी तुझसे शराब मांगता कैसे

इबारतें जिसकी अपने ख़ूँ से लिखी थीं
ख़ुदा से वो किताब मांगता कैसे

मैं एक चांद पे मरता हूँ, जानते हैं सभी
इबादत में आफ़ताब मांगता कैसे

2 Responses to “मांगता कैसे”

  1. 1
    Arun K Dwivedi Says:

    kya baat hi kamal kar diya aap ne…..

  2. 2
    Kuldeep Azad Says:

    Arun Bhai,

    Jab aapko saamne wale ki Majboori pata hoti hai
    tab aap Sirf ye kah sakte hain…

    “मांगता कैसे” ?

    Ye Kamaal nahi hai Dost sachchhayi hai

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