रचनाएँ

बावरे ये लोग

कुलदीप आज़ाद

दिल्ली में नया था मैं
अपनी गली भूल गया
ख़ामख़्वाह ही लोग इसे
सिलसिला समझते हैं
दोस्तों की दास्तानों को
क़लम क्या दी मैंने
बावरे ये लोग
मुझे दिलजला समझते हैं

2 Responses to “बावरे ये लोग”

  1. 1
    Shubhra Says:

    ऐसा लगता है आपने हमारी दास्तां को कलम दे दी। दिल्ली आने से लेकर अब तक…….

  2. 2
    Kuldeep Azad Says:

    हाँ ये हम सब की दास्ताँ है ……!

    थोडी मेरी थोडी आपकी .

    और इस तरह पूरी हमारी ….!

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