रचनाएँ

मैंने ज़िन्दगी देखी है

कुलदीप आज़ाद

रोज़ रात सजती महफ़िलों में
अक्सर ख़ामोश तनहाई देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

फ़क़त हँसाना जिनका पेशा है
उनकी आँखों में नमी देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

इक जनाज़े को कंधा दिया एक दिन
क्या होती है किसी की कमी, देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

कल तमाम रात रोते हुए गुज़री
सुबह बिस्तर पे फ़िज़ा शबनमी देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

उन दिनों
जब मैं दर्द से तड़पता था
कई दिलों में सुकूँ
कई चेहरों पे हँसी देखी है॥
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

वो जो दुनिया को ख़ाक़ करने चले थे
जहाँ दबे हैं वे
वो ज़मीं देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

2 Responses to “मैंने ज़िन्दगी देखी है”

  1. 1
    deep Says:

    mai tumaharay in anubhavo ko antim nahi maan raha hoo. aur ish kavita kay kay anubhavo ko tum pustak kay roop may day saktay ho.

  2. 2
    Kuldeep Azad Says:

    Hmmmm,

    Jab tak main Jinda hoon
    mere Alava kuch bhee Antim nahi

    Ye aapka Sujhaav such Bahut achchha hai
    main Vichaar Karunga…!

    Guljaar saab ki kuch Pangtiyaan mujhe Behaad
    pasand hai…

    Jindagi kya hai Jaanane ke liye,
    Jinda rahna Bahut Jaroori hai

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