सिर्फ़ सन्नाटा सुलगता है

सिर्फ़ सन्नाटा सुलगता है

राजगोपाल सिंह

सिर्फ़ सन्नाटा सुलगता है यहाँ साँझ ढले
ताज़गी बख्श दे ऐसा कोई झोंका तो चले

गाँव के मीठे कुएँ पाट दिए क्यों हमने
इसका एहसास हुआ प्यास से जब होंठ जले

यूँ तो हर मोड़ पे मिलने को मिले लोग बहुत
धूप क्या तेज़ हुई साथ सभी छोड़ चले

ऑंख में चुभते हैं अब ये रुपहले मंज़र
दिल सुलगता है हरे पेड़ों की ज़ुल्फ़ों के तले

एक अरसे से भटकता हूँ गुलिस्तानों में
कोई काँटा तो मिले जिससे ये काँटा निकले

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