रचनाएँ

आँसुओं का ज़लज़ला अच्छा लगा

राजगोपाल सिंह

आँसुओं का ज़लज़ला अच्छा लगा
तपती आँखों को छुआ, अच्छा लगा

वो हमारे बीच रहकर भी न था
आईने का टूटना अच्छा लगा

अब के सावन में भी जाने क्यों हमें
बादलों का रूठना अच्छा लगा

आग बरसाती हुई उस धूप में
नीम का इक पेड़ था, अच्छा लगा

आंधियों के गाँव में आया नज़र
इक दीया जलता हुआ, अच्छा लगा

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