रचनाएँ

पहले कभी देखा न था

राजगोपाल सिंह

हमने ऐसा हादिसा पहले कभी देखा न था
पेड़ थे पेड़ों पे लेकिन एक भी पत्ता न था

ख़ुशनसीबों के यहाँ जलते थे मिट्टी के चराग़
था अंधेरा किन्तु तब इतना अधिक गहरा न था

तिर रही थी मछलियों की सैकड़ों लाशें मगर
जाल मछुआरों ने नदिया में कोई फेंका न था

आदमी तो आदमी था साँप भी इक बार को
दूध जिसका पी लिया उसको कभी डसता न था

ख़ून अपना ही हमें पानी लगेगा एक दिन
प्यास अपनी इस क़दर बढ़ जाएगी सोचा न था

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