रचनाएँ

मेरे निशां

नील

आजकल
समन्दर के किनारे चलते-चलते
जब कभी पीछे घूमता हूँ
मुड़ता हूँ
अपने ही पैरों के निशां
देखने के लिए
पर मिलते कहाँ हैं!

कोई आवारा लहर
मिटा देती है
मेरे क़दमों के निशां
कोई हवा का कुँआरा झोंका
उड़ा ले जाता है
मेरे चलने के निशां
फिर भी मैं चलता हूँ
अनवरत चलता हूँ
एक विश्वास लिए मन में
एक दिन
कर्म के हथौड़े
और मेहनत की छैनी से
गढूंगा वक़्त के सीने पर
कुछ ऐसे निशां
जिन्हें न हवा का डर होगा
न कुँआरे झोंकों का भय
वक़्त के सीने पर ये निशां
हमेशा जड़े रहेंगे
और वक़्त संजोकर रखेगा
अपने सीने में
मेरे चलने के निशां!

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