सागर के गर्भ में

सागर के गर्भ में

नील

हर पल तुम लेती
एक नया आकार
एक नई गति
लहरों की तरह
मेरे अंतर में।

चाहती है सब कुछ समेटना
वापस लौटना
सागर के गर्भ में
जहाँ से
उसे पता है
फिर लौटना है वापस
फिर मिलना है रेत से
सीपियों से
बसना है उनके अंतर में
हमेशा-हमेशा और हमेशा के लिए
फिर भी तुम्हारी गति
तुम्हारा आकार
बनती है मेरी गति
मेरा आकार
मेरा अंतर।

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