पाने की चाह

पाने की चाह

नील

किसी देवता की
मासूम उदासी की तरह
वो मेरी ऑंखों में
कुछ ऐसे सजी है
जैसे मंदिर के अहाते में
बनी रंगोली में
सजा हो स्वास्तिक कोई!

पूरी प्रार्थना के साथ
जलता है आरती का दीया कोई।
किसी माथे पर दमकती है रोली
जिस पवित्रता के साथ
कोई बूढ़ा पूजारी बजाता है
काँपते हाथों से शंख
जिस आस्था के साथ।
वह मुझमें कुछ ऐसे ही बसी रही
जीवन भर!

यह भी सच है
जीवन भर उसे पाने की चाह
मेरे सामने यूँ ही खड़ी रही।
जैसे एक बालक खड़ा रहता है
मंदिर के द्वार पर
ऊँचे टंगे हुए
घण्टे को बजाने के लिए

One Response to “पाने की चाह”

  1. 1
    sachin Says:

    lajawaab , lajawaab , lajawaab………..

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