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सीपियाँ

नील

एक छोटी-सी लड़की
अपना छोटा-सा जाल लेकर
नीला फ्रॉक पहने
रोज़ आती है नीले समन्दर के किनारे
डालती है जाल
चुनती है सीपियाँ
मटमैली, पीली, नीली
सफेद सीपियाँ!

उसे मोती भी मिलते हैं
वो फेंक देती है
क्योंकि उसे सिर्फ सीपियाँ चाहिएँ
कल वाली से सुन्दर कोई सीपी
नहीं जानती वो छोटी लड़की
कल वाली सीपी ज्यादा सुन्दर थी
या आज वाली
खींचती है जाल
तो कुछ ग़ुलाबी शंख
उभरते हैं उसके हाथों पर!

वो कल फिर आएगी
नीला फ्रॉक पहने
नीले समन्दर के किनारे
जाल डालेगी, मोती फेंकेगी
चुनेगी सीपियाँ
कल वाली से सुन्दर
कोई चमकती हुई
सुनहरी-सी सीपी।

3 Responses to “सीपियाँ”

  1. 1
    shubhra Says:

    सच बचपन की कितनी भोली और जीवंत तस्वीर प्रस्तुत की है आपने।
    उसे मोती भी मिलते हैं
    वो फेंक देती है
    क्योंकि उसे सिर्फ सीपियाँ चाहिएँ

  2. 2
    shubhra Says:

    उसे मोती भी मिलते हैं
    वो फेंक देती है
    क्योंकि उसे सिर्फ सीपियाँ चाहिएँ
    बहुत खूबसूरत कविता है। चाहते भी अजीब होती है। मानवीय संवेदना को बहुत बारीकी से शब्दों का रूप देने के लिए बधाई।

  3. 3
    Charvi Says:

    wo ladki un seepiyo ko ikatha karke maala banati hogi aur ….apne gale mai pehan kar sochti hogiii samundar ko gale se laga liya …..

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