मैं चांद से रूठा

मैं चांद से रूठा

नील

मैं चांद से रूठा
कई दिन उसे देखा भी नहॅ
न उससे बात की
न उसके बारे में सोचा
ये भी न सोचा कि वो कैसा होगा
तनहा ही सफ़र काटता होगा रात का
या मुझे कहीं ढूंढता होगा ज़मीं पर
प्यासा होगा
या घिरा होगा
काले-काले बादलों से
क्यों देख्रू?
क्यों सोचूँ?
क्यों बात करूँ

मैं उस चांद की मानँ
या उसकी
जो मेरी ज़िन्दगी है
मेरी ज़िन्दगी ने मुझसे कहा
कि चांद निहारता है उसे रात-रात भर
झाँकता है
उसकी सुरमई
काली-काली ऑंखों में
काले-काले बादलों के पीछे से!
मैंने एक रात चांद से कह ही दिया
बड़ा छलिया है रे तू
प्रेयसी मेरी, तू निहारता क्यों है?
मेरे अधिकार क्षेत्र में तू आता क्यों है?
चांद मुस्कुराया और बोला-
”वाह रे वाह आदमी!
तू भी तो नहाता है
रात-रात भर मेरी चांदनी में
अंजुलियाँ भर-भर पीता है मेरी चांदनी को
और मेरी चांदनी की चादर सजाता है
अपनी प्रेयसी के लिए!
मैं कब रूठा?
रोज़ आता हूँ तुझसे मिलने
तेरी छत पर
देता हूँ तुझे
मौसम मिलन के
अब न आऊंगा
अब न बात करूंगा
पर एक बात बता
क्या तू रह पाएगा मेरे बिना?
तेरा प्रेम और तेरी प्रेयसी रह पाएगी
मेरी चांदनी की चादर के बिना….?

2 Responses to “मैं चांद से रूठा”

  1. 1
    Charvi Says:

    hummm………….bht gussa aata hai apko …chand ko to itni sari bate suna di apne …magar ye bhool gaye ki akele mai premika ka chehra bhi dikhta hai chand mai …..

  2. 2
    abhinandan Says:

    i like this

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