हज़ार वलवले उट्ठेंगे

हज़ार वलवले उट्ठेंगे

राजगोपाल सिंह

हज़ार वलवले उट्ठेंगे हम जहाँ होंगे
सफ़र में ऐसे कई बार इम्तिहां होंगे

मेरी ज़बान पे ख़ंजर अछालने वाले
मेरे सफ़र से जो गुज़रे तो हमज़बां होंगे

ये जातने तो उजाला न माँगते हरगिज़
जलेंगे दीप जहाँ मोम के मकां होंगे

मेरी निगाह से देखो तो देख पाओगे
गगन के पार कई और आसमां होंगे

उतर के देख समुन्दर में थाह ले तो ज़रा
कि तुझसे ऊँचे हिमालय कई वहाँ होंगे

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